अमेरिका में रह रही भारतीय मूल की जाने-माने कैंसर शोधकर्ता डॉ. रचना श्रॉफ का 47 साल की उम्र में निधन हो गया है। यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना कैंसर सेंटर की एसोसिएट डायरेक्टर और हेमेटोलॉजी-ऑन्कोलॉजी डिवीजन की चीफ डॉ. श्रॉफ उसी प्रकार के कैंसर से जूझ रही थीं, जिसके इलाज पर उन्होंने अपना करियर समर्पित किया था। मई 2026 में लिम्फ नोड सूजन के बाद उनकी बीमारी की पुष्टि हुई और अक्टूबर में उनका निधन हो गया।
अमेरिकी-भारतीय डॉक्टर रचना श्रॉफ का निधन ऑन्कोलॉजी जगत के लिए बड़ी क्षति माना जा रहा है। वे पैन्क्रियाटिक कैंसर, बाइल डक्ट कैंसर (कोलांजियोकार्सिनोमा) और हीपाटोबिलरी कैंसर जैसे दुर्लभ और कठिन इलाज वाले कैंसर पर शोध करने वाली प्रमुख विशेषज्ञ थीं।
यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना कॉलेज ऑफ मेडिसिन-टक्सन ने 12 अक्टूबर 2026 को उनके निधन की पुष्टि की। डॉ. श्रॉफ एसोसिएट डायरेक्टर ऑफ क्लिनिकल इन्वेस्टिगेशंस और डिवीजन ऑफ हेमेटोलॉजी/ऑन्कोलॉजी की चीफ थीं। वे जॉन एफ. और वैली एस. डुवाल एंडोड प्रोफेसर फॉर गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ऑन्कोलॉजी भी थीं।
मई 2026 में उनके एक लिम्फ नोड में सूजन दिखाई दी। शुरू में इसे लिंफोमा समझा गया, लेकिन जांच में पता चला कि यह एडेनोकार्सिनोमा है, जो अंगों की ग्रंथिल कोशिकाओं से शुरू होता है। कैंसर तेजी से फैल गया और पेट या आंत से उत्पन्न होने का संकेत मिला। यह टर्मिनल स्टेज में पहुंच चुका था।
बीमारी का पता चलने के बावजूद डॉ. श्रॉफ ने अपना काम नहीं छोड़ा। डायग्नोसिस के कुछ दिन बाद ही उन्होंने अमेरिकन सोसाइटी ऑफ क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी (ASCO) के सम्मेलन में भाग लिया। वे क्लीनिकल ट्रायल्स में सक्रिय रहीं और युवा शोधकर्ताओं का मार्गदर्शन करती रहीं।
डॉ. श्रॉफ ने 80 से अधिक शोध पत्र लिखे और 130 से अधिक पेशेवर व्याख्यान दिए। वे एमडी एंडरसन कैंसर सेंटर से यूनिवर्सिटी ऑफ एरिजोना आई थीं और दक्षिणी एरिजोना में क्लीनिकल ट्रायल की पहुंच बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाइल डक्ट कैंसर पर उनके नेतृत्व वाले ट्रायल्स ने इस दुर्लभ बीमारी के इलाज के विकल्पों को आगे बढ़ाया।
सितंबर 2026 में, जब वे खुद जीवन-सीमित कैंसर से जूझ रही थीं, उन्होंने कॉनकर कैंसर-रचना श्रॉफ, एमडी, एमएस, एफएएससीओ एंडोड यंग इन्वेस्टिगेटर अवॉर्ड इन बिलियरी कैंसर्स की स्थापना की। कुछ ही हफ्तों में 1.35 मिलियन डॉलर से अधिक की राशि जुटाई गई, ताकि भविष्य के शोधकर्ताओं को सहायता मिल सके।
उनका व्यक्तिगत आदर्श वाक्य था- अगर तुम्हें सूरज की रोशनी नहीं मिल रही तो खुद सूरज बनो। ASCO और अन्य संगठनों ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए उनके योगदान को याद किया।
डॉ. श्रॉफ टक्सन में पली-बढ़ी थीं। उनके पिता देवेंदर त्रिवेदी बायोकेमिस्ट और माता डॉ. अमिता त्रिवेदी नेफ्रोलॉजिस्ट थीं। वे पति डॉ. पुनीत श्रॉफ, बेटी सिमरन और बेटे सचिन के साथ रहती थीं। उनके माता-पिता और बहन नीमा साहनी भी अमेरिका में हैं।
उनकी मौत ने कैंसर शोध समुदाय को झकझोर दिया है। वे न सिर्फ एक कुशल चिकित्सक-वैज्ञानिक थीं, बल्कि एक समर्पित मेंटर भी रहीं, जिन्होंने अंतिम समय तक अगली पीढ़ी के शोधकर्ताओं के लिए रास्ता बनाने का प्रयास किया।